क्रिसमस vs तुलसी पूजन दिवस


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कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि 25 दिसंबर को भारत में हिंदू समाज के कुछ लोग तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाते हैं। क्या ये हिंदू धर्म के मुख्य त्योहारों की तरह ही हज़ारों सालों से मनाया जा रहा है? या फिर इतिहास फिर से दोहरा रहा है? आइए जानने की कोशिश करते हैं।

प्रसिद्ध रूप से 25 दिसंबर को क्रिसमस नाम का त्योहार मनाया जाता है जो कि ईसाई धर्म का सबसे बड़ा त्योहार है। और ईसाई धर्म के मानने वालों का यह मानना ​​है कि आज से 2000 साल पहले 25 दिसंबर को Jesus Christ(जीसस क्राइस्ट) जिनको भारत में ईसा मसीह कहते हैं, उनका जन्म हुआ था। उसी दिन से क्रिसमस मनाया जाता है। जीसस क्राइस्ट की ऐतिहासिकता को लेकर इतिहासकारों में विवाद है कि जीसस नामक मनुष्य वास्तव में था भी या नहीं, उनका जन्म कब और कहाँ हुआ, इसके बारे में भी कई सारी कहानियां हैं। और उनकी प्रमाणिकता पर भी संदेह है।
हमको सत्य की खोज में अतीत में और भी पीछे जाना होगा। वर्ष 200 ईसवी के आसपास के एक शुरूआती क्रिस्चियन हैं - Titus Flavius Clemens (आमतौर पर Clement of Alexandria के नाम से जाना जाता है), उन्होंने जीसस के जन्म के बारे में क्या कहा, एक बार उसको जान लेते हैं -

“ऐसे लोग हैं जिन्होंने न केवल हमारे प्रभु के जन्म का वर्ष निर्धारित किया है, बल्कि दिन भी निर्धारित किया है और वे कहते हैं कि यह ऑगस्टस के 28वें वर्ष में हुआ था, और [मिस्त्र के महीने] Pachon के 25 वें दिन (20 मई) में हुआ था। इसके अलावा दूसरों का कहना है कि उनका जन्म Pharmouthi की 24 या 25 (20 या 21 अप्रैल) को हुआ था।”

इस source(स्रोत) से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं की 200 ईसवी तक जीसस क्राइस्ट के जन्म का वर्ष और दिनांक निश्चित नहीं की गयी थी। लोगों में confusion(भ्रम) था कि 20 मई को या 20 अप्रैल या 21 अप्रैल को जीसस का जन्मदिन है। जीसस के जन्म के 200 वर्ष बाद भी किसी भी प्रकार से 25 दिसंबर उनके जन्मदिन के रूप में नहीं जाना जाता था।
प्राचीन रोमन साम्राज्य में 25 दिसंबर को Sol Invictus (सूर्यदेव) के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता था। फिर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि सूर्यदेव का जन्मदिन क्रिसमस बन गया?
इतिहास कि दृष्टि से समझते हैं कि 25 दिसंबर इतना खास दिन क्यों था ? रोमन कैलेंडर के अनुसार 25 दिसंबर winter solstice का दिन हुआ करता था, वह दिन जब सूरज northern hemisphere(उत्तरी गोलार्द्ध) की ओर वापिस आने कि अपनी यात्रा शुरू करता है। इसी समय से दिन लम्बे होने लगते हैं, जो रोशनी कि वापसी का प्रतीक है। इसीलिए 274 ईसवी में Emperor Aurelion ने 25 दिसंबर को “Dies Natalis Solis Invicti” सूर्यदेव का जन्मदिन मनाना शुरू किया।

परन्तु जीसस का जन्मदिन अभी भी निश्चित नहीं हुआ था। Christians क्रिसमस को अपने अनुसार अलग-अलग दिनांक पर मनाया करते थे। अभी तक हम इन sources के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सूर्यदेव का जन्मदिन 25 दिसंबर को मनाया जाता था। 325 ईसवी तक भी जीसस के जन्म की कोई दिनांक निर्धारित नहीं थी।

पहली बार 336 ईसवी में Filocalus के कैलेंडर में Natalis Invicti और क्रिसमस 25 दिसंबर को दर्शाया गया। यह पहला source है जब हमें क्राइस्ट का जन्मदिन 25 दिसंबर के दिन होने का पता चलता है।

अब आगे हम जानेंगे की christian leaders कैसे आम christian followers को Roman Pagan(मूर्तिपूजक) धर्म के त्योहारों में सम्मिलित होने पर और उत्सव मनाने पर क्या कहते थे -

जैसे आजकल कुछ हिन्दुओं को अजीब महसूस होता है कि बहुत सारे हिन्दू क्रिसमस क्यों मनाते हैं? ऐसे ही हम शुरूआती ईसाइयों का same reaction देख सकते हैं।

अब बात करते हैं 21वीं सदी की जब कुछ लोग 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाने लगे हैं। तुलसी पूजन दिवस कोई हजारों वर्षों पुराना त्योहार नहीं है अपितु हिन्दू धर्म का सबसे नवीनतम त्योहार है। 2014 में आसाराम बापू ने 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाने का आह्वाहन किया। अब हमको 11 वर्ष हो चुके हैं। बहुत से हिन्दू तुलसी पूजन दिवस को मनाते हैं।

तुलसी पूजन दिवस इसीलिए शुरू किया गया कि हिन्दुओं द्वारा क्रिसमस में सम्मिलित न होकर खुद का त्योहार मनाया जाये। ये एक अलग तरह का रोष है। आप प्रेम, सम्मान, मन कि शांति के लिए नहीं विरोध करने के लिए पूजन कर रहे हैं, त्योहार मना रहे हैं। इससे आखिरकार क्या हासिल होगा?

हम जानते हैं कि Christianity का इतिहास भारत में बर्बरता से भरा हुआ है, अत्याचारों से भरा हुआ है। कैसे क्रिस्चियन मिशनरीज ने गोवा में Inquisition किया जो कि गोवा की पुर्तगाली colonial सरकार की official नीति थी। St. Xavier का ही उदाहरण ले लीजिये - उस व्यक्ति को संत की उपाधि दी गयी है, जिसने हिन्दुओं के खिलाफ अत्याचारों की सारी सीमायें लांघ दी। St. Xavier के नाम से आपको भारत में schools देखने को मिलेंगे यह तो ऐसा है कि हिटलर के नाम के schools Israel में बनाये जाये। आज भी क्रिस्चियन मिशनरीज हिन्दुओं को साम-दाम-दंड-भेद की नीति से कन्वर्ट करने में लगे हुए हैं। हिन्दू समाज का रोष व्यक्त करना एकदम जायज हैं। Tribal communities पर mass scale पर conversion किया जा रहा है। आप नार्थ-ईस्ट इंडिया का religious map देखिये तो आपको पता चलेगा कि जो लोग अतीत में जनजातीय Pagan/मूर्तिपूजक धर्म या हिन्दू धर्म follow करते थे, आज अधिकांश लोग क्रिस्चियन बन चुके हैं। आज भी जनजातीय लोगों को बहला फुसला कर, धोखा देकर, पैसे का लालच देके कन्वर्ट करने का कार्य निरंतर जारी है।

हिन्दुओं पर ये आघात लगातार जारी हैं परन्तु किसी और के त्योहार के विरोध में अपना खुदका त्योहार बना लेना ये कुछ समझ नहीं आता। जैसे christians ने Natalis Invicti पर कब्ज़ा किया था वैसे ही, क्या हिन्दू क्रिसमस पर इस कब्जे को Justify कर सकेंगे?

वर्तमान सन्दर्भ में Conversions को रोकने तथा मिशनरीज के कुकृत्यों पर अंकुश लगाने के लिए बनावटी त्योहारों का निर्माण करने के स्थान पर आवश्यकता है कड़े से कड़े राष्ट्रव्यापी एंटी-मिशन laws की। चीन की तरह मिशनरीज और उनके missions पर पूरी तरह पाबंदी लगाने की आवश्यकता है, मिशनरीज और religious schools को बंद करने की जरूरत है।

University of Atlanta के Steven Hijmans नाम के archaeologist और साथ ही कुछ और christians का यह मानना है कि 25 दिसंबर को christians पहले से ही क्रिसमस मनाया करते थे और Pagans का जो त्योहार है, 25 दिसंबर को वो केवल क्रिसमस के विरोध में मनाया जाने लगा न कि vice-versa। ये तो बिलकुल ऐसा है कि भविष्य में कोई तुलसी पूजक कहने लगे कि क्रिसमस को christians तुलसी पूजन दिवस के विरोध में मना रहे हैं।

साथ ही यह भी समझना होगा कि तुलसी पूजन दिवस क्रिसमस मनाने का विरोध नहीं है, अपितु हिन्दुओं द्वारा क्रिसमस में सम्मिलित होने तथा उसको अपनाने का विरोध है। क्योंकि एक तरफ से अगर केवल षड़यंत्र हो रहे हैं, तो हिन्दुओं को अपना बचाव करने का भी अधिकार है।

तो हम वापिस अपने शुरूआती सवाल पर आते हैं कि - “क्या इतिहास फिरसे दोहरा रहा है?” चर्चा करने के बाद और sources के अनुसार आप गौर करेंगे तो यह ऐसा ही है जैसे 25 दिसंबर को Pagans/मूर्तिपूजकों का त्योहार था, उस पर ईसाइयों ने कब्ज़ा कर लिए। वैसे ही तुलसी पूजन दिवस मनाकर क्रिसमस पर कब्ज़ा किया जा रहा है। क्योंकि तुलसी पूजन दिवस मनाने का कोई तार्किक आधार नहीं है, केवल रोष और विरोध है। यदि वास्तव में इतिहास को पढ़ा और समझा जाता, उससे सीखा जाता तो सम्भावना थी कि लोग 25 दिसंबर को सूर्यदेव के जन्मदिन के रूप में फिरसे जश्न मना रहे होते, जिसका ऐतिहासिक आधार भी होता। बेशक Natalis Solis रोमन त्योहार था, हिन्दू या भारतीय नहीं, परन्तु वो Pagan त्योहार था। हिन्दू धर्म आखिरी और सबसे बड़ा Pagan/मूर्तिपूजक धर्म है, इसीलिए पूरे विश्व के सभी ऐसे religions जो दूसरे धर्म को और उनके followers को नहीं रहने देना चाहते, उनके आघात हिन्दुओं पर हो रहे हैं और होते रहेंगे। इसीलिए अगर तुलसी पूजन दिवस के के स्थान पर सूर्यदेव का जन्मदिन मनाया जाता तो एक तरह से Pagan धर्म में फिरसे जान फूंकने का कार्य होता।

मैं personally अपने स्कूल के समय से 25 दिसंबर को क्रिसमस के स्थान पर सूर्यदेव का जन्मदिन celebrate करते आया हूँ। तब तो तुलसी पूजन दिवस था भी नहीं। इसीलिए हमारे राजनैतिक और धार्मिक नेताओं को इतिहास का ज्ञान होना चाहिए कि बिना किसी आधार के कुछ उल्टा-सीधा न कर दें। मेरा उद्देश्य यह ज्ञान बांटने का था अब आप क्या चाहते हैं वो आपके ऊपर है? आप तुलसी पूजन दिवस ही मनाना चाहते हैं या फिर सूर्यदेव का जन्मदिन, ये आपका खुद का फैसला होगा। जिसके परिणाम पूरे विश्व पर ही होंगे इसीलिए सोच समझकर फैसला लीजिये।


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